पाठ्यक्रम: GS3/डिजिटल समावेशन
संदर्भ
- राष्ट्रीय अनुप्रयुक्त आर्थिक अनुसंधान परिषद (NCAER) द्वारा जारी “भारत में डिजिटल समावेशन के विकसित होते परिदृश्य” शीर्षक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में डिजिटल विभाजन एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है।
प्रमुख निष्कर्ष
- भारत की डिजिटल क्रांति और समावेशन की चुनौती: भारत की डिजिटल क्रांति लगभग प्रत्येक परिवार तक मोबाइल फोन पहुँचाने में सफल रही है, किंतु सार्थक डिजिटल समावेशन सुनिश्चित करने में अभी भी अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं हो सकी है।
- लगभग सार्वभौमिक पहुँच : 95.1 प्रतिशत परिवारों के पास मोबाइल उपकरण उपलब्ध हैं।
- 74.8 प्रतिशत परिवारों के पास स्मार्टफोन अथवा इंटरनेट-सक्षम मोबाइल फोन उपलब्ध है।
- इसके बावजूद 15 वर्ष एवं उससे अधिक आयु के केवल 39.7 प्रतिशत व्यक्ति ही इंटरनेट का उपयोग करते हैं।
- संपर्कता अंतराल अब भी विद्यमान : लगभग 27.5 प्रतिशत परिवार अभी भी इंटरनेट से वंचित हैं।
- ग्रामीण भारत में यह अनुपात 32.2 प्रतिशत है।
- सबसे निम्न उपभोग वर्ग में 52.1 प्रतिशत परिवार अब भी ऑफलाइन हैं।
- उपयोग का स्वरूप : इंटरनेट से जुड़े परिवारों में भी इसका उपयोग मुख्यतः मनोरंजन तक सीमित है।
- लगभग 66 प्रतिशत लोग फिल्में, टेलीविजन कार्यक्रम अथवा समाचार सामग्री देखने के लिए इंटरनेट का उपयोग करते हैं।
- 53.8 प्रतिशत लोग सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं।
- इसके विपरीत केवल 16.1 प्रतिशत लोग ऑनलाइन पाठ्यक्रमों के लिए तथा 11.4 प्रतिशत लोग डिजिटल माध्यम से सरकारी सेवाओं का लाभ उठाने के लिए इंटरनेट का उपयोग करते हैं।
- छिपा हुआ डिजिटल विभाजन: प्रत्येक पाँच में से एक परिवार को डिजिटल सेवाओं के उपयोग हेतु किसी बाहरी व्यक्ति की सहायता की आवश्यकता पड़ती है।
- औपचारिक शिक्षा से वंचित परिवारों में यह अनुपात बढ़कर प्रत्येक तीन में से एक परिवार तक पहुँच जाता है।
- लैंगिक असमानताएँ : कार्यशील आयु वर्ग में इंटरनेट उपयोग की दर पुरुषों के लिए 57.6 प्रतिशत तथा महिलाओं के लिए 35.6 प्रतिशत है।
- 13 से 16 वर्ष आयु वर्ग के केवल 37.8 प्रतिशत बच्चे सक्रिय रूप से इंटरनेट का उपयोग करते हैं।
- अध्ययन की प्रमुख प्राथमिकताएँ: अध्ययन में निम्नलिखित चार प्रमुख प्राथमिकताओं पर बल दिया गया है—
- किफायती ब्रॉडबैंड तथा सार्वजनिक वाई-फाई सुविधाओं का विस्तार।
- कंप्यूटर एवं साझा डिजिटल उपकरणों तक पहुँच में सुधार।
- डिजिटल साक्षरता एवं कौशल विकास को सुदृढ़ करना।
- महिलाओं, ग्रामीण परिवारों, गरीब परिवारों तथा वंचित समुदायों को लक्षित हस्तक्षेपों के माध्यम से डिजिटल समावेशन बढ़ाना।
डिजिटल समावेशन हेतु सरकारी पहलें
- डिजिटल इंडिया कार्यक्रम: भारत सरकार द्वारा 1 जुलाई 2015 को प्रारंभ किया गया डिजिटल इंडिया कार्यक्रम भारत को ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था तथा डिजिटल रूप से सशक्त समाज में परिवर्तित करने की परिकल्पना करता है।
- एकीकृत भुगतान इंटरफेस : यूपीआई व्यक्तियों एवं व्यापारियों के मध्य त्वरित, परस्पर-संचालनीय तथा सुरक्षित वास्तविक समय भुगतान की सुविधा प्रदान करता है।
- अंतरराष्ट्रीयमुद्रा कोष (IMF) ने वर्ष 2025 की अपनी रिपोर्ट में यूपीआई को लेन-देन की मात्रा के आधार पर विश्व की सबसे बड़ी खुदरा त्वरित भुगतान प्रणाली के रूप में मान्यता दी है।
- भारत में कुल खुदरा भुगतान लेन-देन का लगभग 81 प्रतिशत यूपीआई के माध्यम से संसाधित किया जाता है।
- पीएम-वाणी (PM-WANI): वर्ष 2020 में प्रारंभ किया गया PM-WANI (वाई-फ़ाई एक्सेस नेटवर्क इंटरफ़ेस) ढाँचा विकेंद्रीकृत सार्वजनिक वाई-फाई हॉटस्पॉट्स के माध्यम से किफायती इंटरनेट पहुँच का विस्तार करता है।
- जून 2026 तक राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में 4.10 लाख से अधिक वाई-फाई हॉटस्पॉट संचालित हो रहे हैं।
- डिजिलॉकर : वर्ष 2015 में प्रारंभ किए गए डिजिलॉकर ने नागरिकों को एक सुरक्षित डिजिटल दस्तावेज़ भंडार उपलब्ध कराया।
- यह नागरिकों को सहमति-आधारित पहुँच के माध्यम से प्रमाणित इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों को संग्रहित करने, प्राप्त करने एवं साझा करने की सुविधा प्रदान करता है।
- उमंग : वर्ष 2017 में प्रारंभ किया गया UMANG (नए युग के शासन के लिए एकीकृत मोबाइल एप्लिकेशन) भारत में मोबाइल शासन को प्रोत्साहन देने हेतु विकसित किया गया।
- यह केंद्रीय, राज्य एवं स्थानीय सरकारी संस्थाओं की सेवाओं तक पहुँच के लिए एकीकृत मोबाइल एवं वेब मंच प्रदान करता है।
- भारतनेट एवं राष्ट्रीय ब्रॉडबैंड मिशन भारतनेट तथा राष्ट्रीय ब्रॉडबैंड मिशन जैसी पहलों ने ग्रामीण ब्रॉडबैंड संपर्कता एवं सार्वजनिक वाई-फाई पहुँच को सुदृढ़ किया है।
- कॉमन सर्विस सेंटर (CSCs): वर्ष 2014 में 0.83 लाख केंद्रों से बढ़कर अप्रैल 2026 तक 5.01 लाख से अधिक कार्यरत केंद्र स्थापित हो चुके हैं।
- ये केंद्र ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में डिजिटल पहुँच तथा नागरिक सेवाओं के वितरण को सुदृढ़ बनाते हैं।
- दीक्षा (DIKSHA): दीक्षा (ज्ञान साझा करने के लिए डिजिटल बुनियादी ढांचा) एक एकीकृत एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) समर्थित डिजिटल शिक्षा मंच है।
- इसके 2 करोड़ से अधिक पंजीकृत उपयोगकर्ता हैं।
- सभी राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेश इस मंच से जुड़े हुए हैं।
- इस मंच पर 7,497 ऊर्जीकृत पाठ्यपुस्तकें तथा 3.74 लाख से अधिक ई-सामग्री संसाधन उपलब्ध हैं।
- ई-शासन : भारत में ई-शासन ने सरकारी सेवाओं को अधिक सुलभ, पारदर्शी एवं कुशल बनाकर नागरिकों और सरकार के मध्य संवाद की प्रकृति में क्रांतिकारी परिवर्तन किया है।
- इसमें मिशन कर्मयोगी, डिजिलॉकर तथा उमंग ऐप जैसी पहलें शामिल हैं।
आगे की राह
- डिजिटल अवसंरचना का सुदृढ़ीकरण: भारतनेट के अंतर्गत विशेष रूप से दूरस्थ एवं जनजातीय क्षेत्रों में ब्रॉडबैंड संपर्कता का तीव्र विस्तार किया जाए।
- 4G एवं 5G सेवाओं के कवरेज में वृद्धि की जाए तथा इंटरनेट सेवाओं की विश्वसनीयता को बेहतर बनाया जाए।
- डिजिटल साक्षरता को प्रोत्साहन: विशेष रूप से महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों तथा ग्रामीण जनसंख्या के लिए डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों का विस्तार किया जाए।
- लैंगिक डिजिटल विभाजन का समापन: महिलाओं की मोबाइल फोन, इंटरनेट सेवाओं तथा डिजिटल कौशल प्रशिक्षण तक पहुँच बढ़ाने हेतु लक्षित कार्यक्रम संचालित किए जाएँ।
- क्षेत्रीय भाषाओं में सामग्री को प्रोत्साहन: भारतीय भाषाओं में डिजिटल सेवाओं, अनुप्रयोगों एवं सामग्री का विस्तार किया जाए।
- डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) का विस्तार: आधार, यूपीआई तथा डिजिलॉकर जैसे प्लेटफॉर्मों की पहुँच को और व्यापक बनाया जाए।
- साथ ही समावेशिता एवं निजता संरक्षण सुनिश्चित किए जाएँ।
- सार्वजनिक-निजी भागीदारी का सुदृढ़ीकरण: सरकार, उद्योग, नागरिक समाज एवं शैक्षणिक संस्थानों के मध्य सहयोग को प्रोत्साहन देकर समावेशी डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण किया जाए।
निष्कर्ष
- डिजिटल समावेशन को केवल इंटरनेट उपलब्धता तक सीमित न रखते हुए उसे किफायत, सुगमता, डिजिटल कौशल, साइबर सुरक्षा तथा डिजिटल अर्थव्यवस्था में सार्थक भागीदारी से जोड़ना आवश्यक है।
- ऐसा दृष्टिकोण ही एक डिजिटल रूप से सशक्त, समावेशी एवं आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की परिकल्पना को साकार करने में सहायक सिद्ध होगा।
Source: TOI
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